पुलिस को की गई सामान्य शिकायत, नहीं होती एफ आई आर

एफ आई आर का आशय

प्रथम सूचना रिपोर्ट या एफआईआर (First Information Report या FIR) एक लिखित प्रपत्र (डॉक्युमेन्ट) है परंतु इसे पुलिस को दिए जाने वाला सामान्य शिकायती आवेदन नहीं माना जा सकता है वास्तव में एफ आई आर वह है जो भारत, पाकिस्तान, एवं जापान आदि की पुलिस द्वारा किसी संज्ञेय अपराध(cognizable offence) की सूचना प्राप्त होने पर तैयार किया जाता है। यह सूचना प्रायः अपराध के शिकार व्यक्ति द्वारा पुलिस के पास एक शिकायत के रूप में दर्ज की जाती है। कुछ मामलों में एफ आई आर अनुसंधानकर्ता पुलिस अधिकारी भी दर्ज कर सकता है किसी अपराध के बारे में पुलिस को कोई भी व्यक्ति मौखिक या लिखित रूप में सूचित कर सकता है परंतु यह सामान्य सूचना ही होगी एफ आई आर नहीं। प्रथम सूचना रिपोर्ट या फर्स्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट FIR भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के अंतर्गत वर्णित प्रावधानों के अनुरूप निष्पादित एवं नियोजित की जाती है पुनः हम आपको बताना चाहेंगे कि यह एक सामान्य शिकायत वाला आवेदन नहीं है हमने ऐसा देखा है कि भूल बस बहुत से आवेदक पुलिस थाने में या पुलिस अधीक्षक कार्यालय में किसी भी प्रकार की कोई लिखित सूचना देते हैं तो उसे ही एफ आई आर समझते हैं जो गलत है आजकल सूचना प्रौद्योगिकी के काल में एफ आई आर किस रूप में भी व्यापक परिवर्तन हुआ एक समय था जब पुलिस एक सामान्य से प्रिंटेड प्रोफार्मा को पेन से भरकर एफ आई आर दर्ज किया करती थी किंतु अब प्रायः सभी थानों में यह सिस्टम पूर्णता कंप्यूटरीकृत एवं ऑनलाइन हो गया है संक्षेप में हम कह सकते हैं कि एफ आई आर प्रताड़ित आवेदक के निवेदन पर पुलिस द्वारा तैयार किया हुआ एक दस्तावेज है जिसमे अपराध की सुचना वर्णित होती है I जो प्राया आज सभी थानों में ऑनलाइन एवं कंप्यूटरीकृत प्रोफार्मा पर आधारित एवं पंजीकृत की जाती है सामान्यत: पुलिस द्वारा अपराध संबंधी अनुसंधान प्रारंभ करने से पूर्व यह पहला कदम अनिवार्य है I
भारत में किसी भी व्यक्ति द्वारा शिकायत के रूप में प्राथमिकी दर्ज कराने का अधिकार है। किंतु कई बार सामान्य लोगों द्वारा दी गई सूचना को पुलिस प्राथमिकी के रूप में दर्ज नहीं करती है। ऐसे में प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए कई व्यक्तियों को न्यायालय का भी सहारा लेना पड़ा है।

ये नही है fir

जब किसी अपराध की सूचना पुलिस अधिकारी को दी जाती है, तो उसे एफ़आइआर नहीं  कहते हैं जब तक की पुलिस भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के अंतर्गत ऑनलाइन प्रोफार्मा में विवरण दर्ज ना कर ले और इस दर्ज विवरण की 1 प्रति आवेदक को प्रदान किया जाना भी अनिवार्य होता है एफ आई आर शब्द का पूरा रूप है- ‘फ़र्स्ट इनफ़ॉरमेशन रिपोर्ट’। आप पुलिस के पास किसी भी प्रकार के अपराध के संबंध में शिकायत दर्ज कराने जाते हैंI अति-आवश्यक एवं गंभीर मामलों मैं पुलिस को FIR तुरंत दर्ज कर अनुसंधान प्रारंभ करना अनिवार्य है I अपराध की सूचना को लिपिबद्ध करने का कार्य पुलिस करती है और अब ज्यादातर थानों में यह प्रक्रिया कंप्यूटरीकृत एवं ऑनलाइन हो गई है यद्यपि कुछ विधि विद्वान मानते हैं की प्रावधान है कि टेलिफोन से प्राप्त सूचना को भी एफ़आइआर की तरह समझा जा सकता है। परंतु जब तक शिकायतकर्ता या पुलिस अधिकारी द्वारा भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के अंतर्गत कंप्यूटरीकृत शिकायत दर्ज ना करवा दी जाए इसे एफ आई आर मानना कानूनी दृष्टि से काफी कठिन होता है  भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के  धारा 154 के तहत एफ़आइआर की प्रक्रिया पूरी की जाती है। यह वह महत्वपूर्ण सूचनात्मक दस्तावेज होता है जिसके आधार पर पुलिस कानूनी कार्रवाई को आगे बढ़ाती है।
एफ़आइआर संज्ञेय अपराध होने पर दर्ज की जा जाती है। संज्ञेय अपराध के बारे में प्रथम सूचना रिपोर्ट कोई भी व्यक्ति दर्ज करवा सकता है। इसके तहत पुलिस को अधिकार होता है कि वह आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार करे और जांच-पड़ताल करे. जबकि अपराध संज्ञेय नहीं है, तो बिना कोर्ट के इजाजत के कार्रवाई संभव नहीं हो पाती। कौन सा अपराध कानूनी दृष्टि से संज्ञेय है या नहीं। इसका विवरण भारतीय दंड संहिता में वर्णित होता है
हालांकि पुलिस की नजर में दी गयी जानकारी में अगर जांच-पड़ताल के लिए पर्याप्त आधार नहीं बनता है, तो वह कार्रवाई के लिए बाध्य नहीं। इस स्थिति में उसे कार्रवाई न करने की वजह को लॉग बुक में दर्ज करना होता है, जिसकी जानकारी भी सामनेवाले व्यक्ति को देनी होती है। पुलिस अधिकारी अपनी तरफ़ से इस रिपोर्ट में कोई टिप्पणी नहीं जोड़ सकता। शिकायत करनेवाले व्यक्ति का अधिकार है कि उस रिपोर्ट को उसे पढ़ कर सुनाया जाये और उसकी एक कॉपी उसे दी जाये। इस पर शिकायतकर्ता का हस्ताक्षर कराना भी अनिवार्य है। अगर थानाध्यक्ष सूचना दर्ज करने से इनकार करता है, तो वरिष्ठ पदाधिकारियों से मिलकर या डाक द्वारा इसकी सूचना देनी चाहिए। ताकि अपराधी को न्यायालय में कंप्लेंट केस दायर कर दंडित करवाया जा सके।

क्या है जीरो पर एफ आई आर

 

जीरो पर f i r
अक्सर FIR दर्ज करते वक़्त आगे के कार्यवाही को सरल बनाने हेतु इस बात का ध्यान रखा जाता हैं कि घटनास्थल से संलग्न थाने में ही इसकी शिकायत दर्ज हो परन्तु कई बार ऐसे मौके आते हैं जब पीड़ित को विपरीत एवं विषम परिस्थितियों में किसी बाहरी पुलिस थाने में केस दर्ज करने की जरुरत पड़ जाती हैं। मगर अक्सर ऐसा देखा जाता हैं कि पुलिस वाले अपने सीमा से बहार हुई किसी घटना के बारे में उतने गंभीर नहीं दिखाए देते. ज्ञात हो कि FIR आपका अधिकार हैं एवं आपके प्रति हो रही असमानताओ का ब्यौरा भी, अतः सरकार ने ऐसे विषम परिस्थितियों में भी आपके अधिकारों को बचाए रखने हेतु ZERO FIR का प्रावधान बनाया है। इसके तहत पीड़ित व्यक्ति अपराध के सन्दर्भ में अविलम्ब कार्यवाही हेतु किसी भी पुलिस थाने में अपनी शिकायत दर्ज करवा सकते हैं एवं बाद में केस को उपरोक्त थाने में ट्रान्सफर भी करवाया जा सकता हैं।

  1. एफआईआर पर न्यायालय में होता है विचारण

आपकी एफआईआर पर क्या कार्रवाई हुई, इस बारे में संबंधित पुलिस आपको सूचित करेगी। साथी पुलिस मामले को अपराधी सहित क्षेत्राधिकार के न्यायालय में प्रस्तुत करेगी और जहां आगे की कार्यवाही न्यायालयीन प्रक्रिया के अंतर्गत न्यायाधीश के मार्गदर्शन में संपादित की जाएगी

अगर थानाध्यक्ष सूचना दर्ज करने से मना करता है , तो सूचना देने वाला व्यक्ति उस सूचना को रजिस्टर्ड डाक द्वारा या मिलकर क्षेत्रीय पुलिस उपायुक्त को दे सकता है , जिस पर उपायुक्त उचित कार्रवाई कर सकता है।

एएफआईआर न लिखे जाने की हालत में आप अपने एरिया मैजिस्ट्रेट के पास पुलिस को दिशा-निर्देश देने के लिए कंप्लेंट केस भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अंतर्गत दायर कर सकते हैं कि शीघ्र केस दर्ज कर एफआईआर की कॉपी उपलब्ध कराई जाए।

अगर अदालत द्वारा दिए गए समय में पुलिस अधिकारी शिकायत दर्ज नहीं करता या इसकी प्रति आपको उपलब्ध नहीं कराता या अदालत के दूसरे आदेशों का पालन नहीं करता, तो उस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के साथ उसे जेल भी हो सकती है।

अगर सूचना देने वाला व्यक्ति पक्के तौर पर यह नहीं बता सकता कि अपराध किस जगह हुआ तो पुलिस अधिकारी इस जानकारी के लिए प्रशन पूछ सकता है और फिर निर्णय पर पहुंच सकता है। इसके बाद तुरंत एफआईआर दर्ज कर वह उसे संबंधित थाने को भेज देगा। इसकी सूचना उस व्यक्ति को देने के साथ-साथ रोजनामचे में भी दर्ज की जाएगी।

अगर शिकायत करने वाले को घटना की जगह नहीं पता है और पूछताछ के बावजूद भी पुलिस उस जगह को तय नहीं कर पाती है तो भी वह तुरंत एफआईआर दर्ज कर जांच-पड़ताल शुरू कर देगा। अगर जांच के दौरान यह तय हो जाता है कि घटना किस थाना क्षेत्र में घटी, तो केस उस थाने को स्थानान्तरित (ट्रान्सफर) हो जाएगा।

अगर एफआईआर कराने वाले व्यक्ति की मामले की जांच-पड़ताल के दौरान मौत हो जाती है , तो इस एफआईआर को मृत्युकालिक कथन (Dying Declaration) की तरह न्यायालय में पेश किया जा सकता है।

अगर शिकायत में किसी असंज्ञेय अपराध का पता चलता है तो उसे रोजनामचे में दर्ज करना जरूरी है। इसकी भी कॉपी शिकायतकर्ता को जरूर लेनी चाहिए। इसके बाद मैजिस्ट्रेट से सीआरपीसी की धारा 155 के तहत उचित आदेश के लिए संपर्क किया जा सकता है।

पुलिस के खौफ में ज्यादातर प्रताड़ित व्यक्ति , बिना एफ आई आर के लौट आते हैं वापस
प्राया सुनने में आता है कि पुलिस ने दबाव बनाकर FIR ( first information report) बदल दी है या पुलिस ने एफ आई आर दर्ज करने से इंकार कर दिया है। पुलिस आम नागरिकों द्वारा कानून की कम जानकारी होने का फायदा उठाती है।
किसी भी अपराध की रिपोर्ट पुलिस को दर्ज करवाने के लिए जैसे ही आप थाने में जाते हैं, तो आपको अपने साथ घटे अपराध की जानकारी देने को कहा जाता है। इसमें अपराध का समय, स्थान, मौके की स्थिति इत्यादि की जानकारी पूछी जाती है। यह सारी जानकारी डेली डायरी में लिखी जाती है जिसे रोजनामचा भी कहा जाता है। बहुत से अनजान लोग इसे ही एफआईआर समझ लेते हैं और अपनी तरफ से संतुष्ट हो जाते हैं। इसलिए जब भी अपराध की रिपोर्ट दर्ज करवाएं एफआईआर लिखवाएं और इसकी कॉपी लें, यह आपका अधिकार है। बहुत से लोग जानकारी के अभाव में पुलिस द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचना पावती या अपराध पुलिस हस्तक्षेप योग्य नहीं पाए जाने संबंधी सूचना कोही एफ आई आर समझ लेते हैं पुलिस से गुमराह होकर लौट आते हैं ।एफआईआर दर्ज करने में लापरवाही और देरी के लिए भी आप जिम्मेदार अधिकारी की शिकायत कर सकते हैं। एफआईआर की पहचान के लिए इस पर एफआईआर नंबर भी दर्ज होते हैं जिससे आगे इस नंबर से मामले में प्रक्रिया चलाई जा सके। अहम बात यह की FIR पंजीकृत करने के लिए किसी भी प्रकार की फीस नहीं लगत। एफ आई आर के ऊपर भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के अंतर्गत आवश्यक रूप से लिखा रहता है और साथ ही अपराध क्रमांक एवं भारतीय दंड संहिता की धाराएं भी लिखी रहती है।
FIR करवाते समय इन बातों का रखें ध्यान
एफआईआर यानी प्रथम सूचना रिपोर्ट तुरंत दर्ज करवाएं। यदि किसी कारण से देर हो जाती है तो फॉर्म में इसका उल्लेख करें। यदि शिकयत मौखिक रूप से दे रहे हैं तो थाना प्रभारी आपकी शिकायत लिखेगा और समझाएगा। आजकल तो एफ आई आर ऑनलाइन और कंप्यूटरीकृत रूप से दर्ज होती है। एफ आई आर दर्ज कराते समय ध्यान रखें एफआईआर सरल भाषा में प्रोफार्मा में दर्ज करवाएं। तकनीकी के तहत जटिल शब्दों का प्रयोग न करें। ध्यान रखें कि आपके आगमन और प्रस्थान का समय एफआईआर और पुलिस स्टेशन के डेली डायरी में अंकित हो गया है।
FIR में दें यह जानकारी
आप किस क्षमता में जानकारी दे रहें हैं
अपराध का दोषी कौन है
अपराध किसके खिलाफ किया गया है
अपराध होने का समय क्या था
अपराध कौन सी जगह पर हुआ
अपराध किस तरीके से हुआ
अपराध के समय कोई गवाह थे
अपराध से होने वाला नुक्सान
ये सभी प्रक्रिया होने पर शिकायत को ध्यान से पढ़ें और उसके बाद उस पर दस्तखत कर दें। थाना प्रभारी इसे अपने रिकॉर्ड में रखेगा। शिकायतकर्ता का ये अधिकार है कि इसकी एक कॉपी उसे भी मिले। इसके लिए कोई फीस या शपथ पत्र देने की ज़रुरत नहीं है। शीघ्र ही घर बैठे बैठे एफ आई आर की प्रक्रिया को सहज करने के लिए सरकार प्रयास कर रही है जिसके अंतर्गत
ऑनलाइन FIR
अब शिकायत करने के लिए पुलिस थाने जाने की जरूरत नहीं रहेगी। आप ऑनलाइन अपनी शिकायत दर्ज करवादेंगे। शिकायत दर्ज करने के 24 घंटे के भीतर थाना प्रभारी आपको फोन करेगा जिसके बाद आप अपनी शिकायत की स्थिति को ऑनलाइन ही ट्रैक कर सकते हैं। ऑनलाइन शिकायत करने के लिए आपको अपना ई-मेल और टेलीफोन नंबर भी दर्ज कराना होगा जिससे पुलिस आपको संपर्क कर सके

सर्वोच्च न्यायालय ने प्राथमिकी यानि की एफआईआर दर्ज करने को अनिवार्य बनाने का फैसला दिया है। एफआईआर दर्ज नहीं करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश भी न्यायालय ने दिया है। न्यायालय ने यह भी व्यवस्था दी है कि एफआईआर दर्ज होने के एक सप्ताह के अंदर प्राथमिक जांच पूरी की जानी चाहिए। इस जांच का मकसद मामले की पड़ताल और गंभीर अपराध है या नहीं जांचना है। इस तरह पुलिस इसलिए मामला दर्ज करने से इंकार नहीं कर सकती है कि शिकायत की सच्चाई पर उन्हें संदेह है।
ये है आपका अधिकार
संज्ञेय अपराध के मामलों में तुरंत एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। एफआईआर की कॉपी लेना शिकायकर्ता का अधिकार है। इसके लिए मना नहीं किया जा सकता है। संज्ञेय अपराध की एफआईआर में लिखे गए घटनाक्रम व अन्य जानकारी को शिकायकर्ता को पढ़कर सुनाना अनिवार्य है। आप सहमत हैं, तो उस पर हस्ताक्षर किए जाने चाहिए। यह जरूरी नहीं कि शिकायत दर्ज करवाने वाले व्यक्ति को अपराध की व्यक्तिगत जानकारी हो या फिर उसके सामने ही अपराध हुआ हो। एफआईआर में पुलिस अधिकारी स्वयं की ओर से कोई भी शब्द या टिप्पणी नहीं जोड़ सकता है।
अगर आपने संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को लिखित रूप से दी है, तो पुलिस को एफआईआर के साथ आपकी शिकायत की कॉपी लगाना जरूरी है।
एफआईआर दर्ज कराने के लिए यह जरूरी नहीं है कि शिकायत करने वाले को अपराध की व्यक्तिगत जानकारी हो या उसने अपराध होते हुए देखा हो।
अगर किसी वजह से आप घटना की तुरंत सूचना पुलिस को नहीं दे पाएं, तो घबराएं नहीं। ऐसी स्थिति में आपको सिर्फ देरी की वजह बतानी होगी।
कई बार पुलिस एफआईआर दर्ज करने से पहले ही मामले की जांच-पड़ताल शुरू कर देती है, जबकि होना यह चाहिए कि पहले एफआईआर दर्ज हो और फिर जांच-पड़ताल। घटना स्थल पर एफआईआर दर्ज कराने की स्थिति में अगर आप एफआईआर की कॉपी नहीं ले पाते हैं, तो पुलिस आपको एफआईआर की कॉपी डाक से भेजेगी। आपकी एफआईआर पर क्या कार्रवाई हुई इस बारे में संबंधित पुलिस आपको डाक से सूचित करेगी। अगर अदालत द्वारा दिए गए समय में पुलिस अधिकारी शिकायत दर्ज नहीं करता या इसकी प्रति आपको उपलब्ध नहीं कराता या अदालत के दूसरे आदेशों का पालन नहीं करता तो उस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के साथ उसे जेल भी हो सकती है।

FIR दर्ज नहीं करें तो करें ये काम
अगर थाना प्रमुख आपकी शिकायत की एफआईआर दर्ज नहीं करता है या मना करता है, तो आप अपनी शिकायत रजिस्टर्ड डाक के माध्यम से पुलिस अधीक्षक को भेज सकते हैं। जो आपकी शिकायत पर कार्रवाई शुरू कर सकता है। इसके अलावा एफआईआर नहीं दर्ज किए जाने की स्थिति में आप अपने क्षेत्र के मैजिस्ट्रेट के पास पुलिस को दिशा-निर्देश के लिए कंप्लेंट पिटीशन दायर कर सकते हैं कि एफ आई आर दर्ज कर आपको एफआईआर की कॉपी उपलब्ध करवाए। मैजिस्ट्रेट के आदेश पर भी पुलिस अधिकारी समय पर शिकायत दर्ज नहीं करता है या फिर एफआईआर की कॉपी उपल्बध नहीं करवाता है, तो उस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती है।
ये भी काम की बातें
एफआईआर की कॉपी पर उस पुलिस स्टेशन की मुहर और थाना प्रमुख के हस्ताक्षर होने चाहिए। एफआईआर की कॉपी आपको देने के बाद पुलिस अधिकारी अपने रजिस्टर में लिखेगा कि सूचना की कॉपी शिकायतकर्ता को दे दी गई है। आपकी शिकायत पर हुई प्रगति की सूचना संबंधित पुलिस आपको डाक से भेजेगी। आपको और पुलिस को सही घटना स्थल की जानकारी नहीं है, तो भी चिंता की बात नहीं। पुलिस तुरंत एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर देगी। हालांकि जांच के दौरान घटना स्थल का थानाक्षेत्र पता लग जाता है तो संबंधित थाने में केस को ट्रांसफर कर दिया जाएगा।
याद रखिये FIR लिखने का 9k फार्मूला
हम सभी को कभी न कभी FIR लिखाना ही पड़ जाता है चाहे खुद के लिये या किसी जानने वाले के लिये। अक्सर लोगो की शिकायत होती है कि उनकी FIR थाने में नहीं लिखी गई, या फिर मजिस्ट्रेट के यहाँ FIR के लिये किया गया आवेदन निरस्त हो गया। इसके तो कई कारण होते है किंतु एक कारण ये भी होता है की आपके लिखने तरीका गलत हो। FIR को कम से कम शब्दों में स्पष्ट और पूरे मामले को लिखना चाहिये क्योंकि न्यायालय में आपका केस इसी आधार पर चलता है । आसान भाषा में FIR को लिखने का तरीका बता रहा हूँ क्योंकि कई बार पढ़े लिखे लोग भी FIR लिखने में गलती कर देते है।
सबसे पहले आप एक सादा पेपर ले और उसपर 1 से 9 तक नंबर लिख ले, फिर उन सब के सामने K लिख ले, बस हो गया आपका FIR ।
9K का मतलब होता है आप नीचे पढ़ेंगे तो स्वतः स्पष्ट हो जायेगा।
(1) कब (तारीख और समय)- FIR में आप घटना के समय और तारीख की जानकारी लिखे ।
(2) कहा (जगह)- घटना कहाँ पे हुई इसकी जानकारी दे।
(3) किसने – अपराध किस ब्यक्ति ने किया ( ज्ञात या अज्ञात) एक या अनेक ब्यक्ति उसका नाम पता आदि लिखे ।
(4) किसको – किस के साथ अपराध किया गया एक पीड़ित है या अनेक उनसब का नाम व पता।
(5) किसलिये – यह एक मुख्य विषय होता है इसीसे यह पता चलता है की कोई कार्य अपराध है या पुरस्कार देने के लायक कार्य है, इसको निम्न प्रकार समझ सकते हैं-
(अ) क एक ब्यक्ति ख पर गोली चला देता है और ख की मृत्यु हो जाता है, क यहाँ पर दोषी होगा।
(ब) क एक ब्यक्ति ख पर अपनी पिस्तौल तान देता है और ख अपने बचाव में क पर गोली चला देता है जिससे क की मृत्यु हो जाती है। ख हत्या का दोषी नहीं है क्योंकि अपनी आत्मरक्षा करते हुवे अगर आप किसी की जान भी ले लेते  है तो आप दोषी नहीं होंगे ।
(स) क अपनी कार से ख तो टक्कर मार देता है और ख की मृत्यु हो जाती है, क हत्या का दोषी नहीं है बल्कि उसपर दुर्घटना का केस चलेगा और उसके हिसाब से दण्ड मिलेगा।
(द) क एक पुलिस कर्मी है और वह आतंकवादी संगठन के मुठभेड़ में एक या कई आतंकवादीयो को मार देता है। क हत्या का दोषी नहीं होगा बल्कि उसे पुरस्कार दिया जायेगा।
इससे यह स्पष्ट होता है की कोई भी कार्य तब तक अपराध नहीं है जब तक की दुराशय से न किया गया हो।
(6) किसके सामने ( गवाह)- अगर घटना के समय कोई मौजूद हो तो उनकी जानकारी अवश्य देनी चाहिये।
(7) किससे ( हथियार) – अपराध करने के लिए किन हथियार का प्रयोग किया गया ( पिस्तौल , डंडे, रॉड, चैन , हॉकी, ईट। अगर कोई धोखाधड़ी का मामला है तो आप ( स्टाम्प पेपर, लेटरहेड, इंटरनेट , मोबाइल, आदि,) जानकारी जरूर प्रदान करे।
(8) किस प्रकार – क्या प्रकरण अपनाया गया अपराध् करने के लिये उसको लिखे।
(9) क्या किया ( अपराध)- इनसभी को मिलकर क्या किया गया जो की अपराध होता है उसको लिखे।
इस प्रकार आप सब आसानी से FIR को लिख सकते है ।
अन्य जानकारी :
FIR आप जहाँ घटना हुई है उसके आलावा भी भारत के किसी भी थाने में जाकर आप FIR लिखा सकते है।
FIR न लिखे जाने के कई कारण होते है, मुख्यतः क्राइम रेट अधिक न हो इस कारण नहीं लिखी जाती है ( जो की गैर कानूनी कारण है) । दूसरा कारण अपराध की सत्यता पर शक होता है जिस कारण पुलिस FIR लिखने से पहले जाँच करना चाहते है।

 

 

 

 

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