स्त्री की पुकार…..मेरी अभिव्यक्ति

रे स्त्री….

कोई नहीं सुनने वाला तेरी करुण पुकार……

जग ये बहरा हो गया है …?

कोई नहीं कहने वाला तेरे हक की बात ….

जग ये गूंगा हो गया है …?

रे स्त्री

अब सुन ले मेरी बात ..

तुझको क्या करना है….?

ना तू जन बेटी को …..

अस्मत लूटी जाएगी ..

कब तक तू उसको मर्यादा और संस्कारों का पाठ पढ़ाइएगी…..

ना जन तू बेटो को भी ।

जो तेरे ही किसी प्रतिरूप को तार-तार कर देता है

जग ये बहरा हो गया है

कौन सुनेगा तेरी करुण पुकार को

रे स्त्री

तेरे हक में आवाज कौन उठाएगा?

नपुंसक हो चली है मानवता सारी ….

तू कब तक फांसी लगाएगी..?

तू कब तक अपनी अस्मत की दुहाई देगी…?

कौन सुनेगा करुण पुकार तेरी…?

कौन तेरे हक में आवाज उठाएगा…..?

ना जन तू बेटों को ना जन बेटी को

तू किसको पाठ सिखाएगी…..

नपुंसक हो चली है मानवता सारी ….

तू भी बांझ हो जा रे स्त्री

अब तू भी बांझ हो जा.…

 

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