[10:10 PM, 12/7/2017] News4indai: जिसको चाहें उसको दें उनकी मर्जी | News 4 India

जिसको चाहें उसको दें उनकी मर्जी

नई दिल्‍ली न्‍यूज 4 इंडिया। जजों के बीच मुकद्मों के आवंटन संबंधी चीफ जस्टिस की शक्तियों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 13 अप्रैल को सुनवाई शुरू कर दी। जस्टिस एके सिकरी और अशोक भूषण की बेंच ने कहा कि संविधान की रक्षा के लिए खुद संविधान ने सीजेआई को यह शक्ति दी हैं। इस पर याचिकाकर्ता शांति भूषण की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट दुष्‍यंत दवे ने कहा, 14 मामलों में चीफ जस्टिस के इस अधिकार का इस्‍तेमाल कई गंभीर सवाल खड़े करता है दवे ने कहा कि गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्‍थाना की सीबीआई के अतिरिक्‍त निदेशक के तौर पर नियुक्ति से जुड़ा केस पहले जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए आया था बाद में बेंच का हिस्‍सा रहे जस्टिस नवीन सिन्‍हा सुनवाई से हट गए। नियमानुसार यह मामला जस्टिस गोगोई की बेंच के समक्ष ही लिस्‍ट करना चाहिए था। लेकिन इसे कोर्ट नंबर आठ में भेजा गया।

इस पर बेंच ने कहा कि जब कोई जज सुनवाई से हटता है तो केस सीजेआई के समक्ष आता है उन्‍होंने जजों के नाम पर घूस मांगने के आरोप जस्टिस जे चेलमेश्‍वर की बेंच के आदेशों का भी जिक्र किया। उन्‍होंने कहा कि सीजेआई उस वक्‍त संविधान पीठ में सुनवाई कर रहे थे ऐसे में जस्टिस चेलमेश्‍वर का आदेश वैद्य था। सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि सीजेआई मास्‍टर आफ रोस्‍टर हैं और पहले भी कई फैसलों में यह कहा जा चुका है इस मुद्दे पर बेंच ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से राय मांगी है अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी। दवे ने कहा कि संविधान में सीजेआई की शक्तियों की बात कही गई है लेकिन उन्‍हें एक व्‍यक्ति के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट रजिस्‍ट्री को नियमों का पालन करना चाहिए। कल को प्रधानमंत्री भी कह देंगे कि मैं देश का शासक हूं और मुझे कोई चुनौती नहीं दे सकता।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कभी यह नहीं कहा हैकि वह देश की संपूर्ण शक्ति हैं अगर वह ऐसा कहते हैं और कुछ ऐसा प्रचलन में आता है तो उस पर कोर्ट में सवाल उठाया जा सकता है।

मुकद्मे आवंटित करने की शक्तियां कॉलेजियम को सौंपने के सुझाव से सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्‍टया असहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि कॉलेजियम में पांच सबसे सीनियर जज होते हैं ऐसे में उन्‍हें रोज या हफ्ते में दो-तीन दिन सिर्फ मुकद्मे आवंटित करने के लिए ही बैठना पड़ेगा। यह संभव नहीं है। जस्टिस सिकरी ने याचिकाकर्ता के वकील से कुछ और सुझाव मांगे। इस पर दुष्‍यंत दवे ने कहा कि कम से कम संवेदनशील मामले तो कॉलेजियम के ही जरिये देने चाहिए। लोकतंत्र में संपूर्ण अधिकार जैसी कोई चीज नहीं होती। राष्‍ट्र और लोकतंत्र के अस्तित्‍व के लिए कई मामले संवदेनशली होते हैं।

 

 

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