[10:10 PM, 12/7/2017] News4indai: प्राकृतिक को सुंदरता प्रदान करने वाले | News 4 India

प्राकृतिक को सुंदरता प्रदान करने वाले

न्‍यूज 4 इंडिया।  सुमित्रानंदन पंत जी का जन्म अल्मोड़ा ज़िले के कौसानी नामक ग्राम में 20 मई 1900 ई. को हुआ। जन्म के छह घंटे बाद ही उनकी माँ का निधन हो गया। उनका लालन-पालन उनकी दादी ने किया। उनका प्रारंभिक नाम गुसाई दत्त रखा गया। वे सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। 1918में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी आ गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण कर वे इलाहाबाद चले गए। उन्हें अपना नाम पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नया नाम सुमित्रानंदन पंत रख लिया। यहाँ म्योर कॉलेज में उन्होंने बारवीं में प्रवेश लिया।

1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के भारतीयों से अंग्रेजी विद्यालयों, महाविद्यालयों, न्यायालयों एवं अन्य सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करने के आह्वान पर उन्होंने महाविद्यालय छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी भाषा-साहित्य का अध्ययन करने लगे।इलाहाबाद में वे कचहरी के पास प्रकृति सौंदर्य से सजे हुए एक सरकारी बंगले में रहते थे। उन्होंने इलाहाबाद आकाशवाणी के शुरुआती दिनों में सलाहकार के रूप में भी कार्य किया। उन्हें मधुमेह हो गया था। उनकी मृत्यु 28 दिसम्बर 1977 को हुई।

सात वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरु कर दिया था। 1918 के आसपास तक वे हिंदी के नवीन धारा के प्रवर्तक कवि के रूप में पहचाने जाने लगे थे। इस दौर की उनकी कविताएं वीणा में संकलित हैं। 1926-27 में उनका प्रसिद्ध काव्य संकलन ‘पल्लव’ प्रकाशित हुआ। कुछ समय पश्चात वे अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा आ गये। इसी दौरान वे मार्क्स व फ्रायड की विचारधारा के प्रभाव में आये। 1938 में उन्होंने “रूपाभ” नामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। शमशेर, रघुपति सहाय आदि के साथ वे प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुडे रहे। वे 1955 से 1962 तक आकाशवाणी से जुडे रहे और मुख्य-निर्माता के पद पर कार्य किया। उनकी विचारधारा योगी अरविन्द से प्रभावित भी हुई जो बाद की उनकी रचनाओं में देखी जा सकती है।

“वीणा” तथा “पल्लव” में संकलित उनके छोटे गीत विराट व्यापक सौंदर्य तथा पवित्रता से साक्षात्कार कराते हैं। “युगांत” की रचनाओं के लेखन तक वे प्रगतिशील विचारधारा से जुडे प्रतीत होते हैं। “युगांत” से “ग्राम्या” तक उनकी काव्ययात्रा प्रगतिवाद के निश्चित व प्रखरस्वरोंकी उदघोषणा करती है। उनकी साहित्यिक यात्रा के तीन प्रमुख पडाव हैं – प्रथम में वे छायावादी हैं, दूसरे में समाजवादी आदर्शों से प्रेरित प्रगतिवादी तथा तीसरे में अरविन्द दर्शन से प्रभावित अध्यात्मवादी। 1907 से 1918 के काल को स्वयं उन्होंने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वीणा में संकलित हैं। सन् 1922 में उच्छवास और 1928 में पल्लव का प्रकाशन हुआ।

सुमित्रानंदन पंत (Sumitranandan Pant) की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं – ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, चिदंबरा, सत्यकाम आदि। उनके जीवनकाल में उनकी 28 पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें कविताएं, पद्य-नाटक और निबंध शामिल हैं। पंत अपने विस्तृत वाङमय में एक विचारक, दार्शनिक और मानवतावादी के रूप में सामने आते हैं किंतु उनकी सबसे कलात्मक कविताएं “पल्लव” में संकलित हैं, जो 1918 से 1924 तक लिखी गई 32 कविताओं का संग्रह है।

हिंदी साहित्य सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण (1961), ज्ञानपीठ(1968), साहित्य अकादमी, तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया। सुमित्रानंदन पंत (Sumitranandan Pant) के नाम पर कौशानी में उनके पुराने घर को जिसमें वे बचपन में रहा करते थे, सुमित्रानंदन पंत वीथिका के नाम से एक संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इसमें उनके व्यक्तिगत प्रयोग की वस्तुओं जैसे कपड़ों, कविताओं की मूल पांडुलिपियों, छायाचित्रों, पत्रों और पुरस्कारों को प्रदर्शित किया गया है। इसमें एक पुस्तकालय भी है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत तथा उनसे संबंधित पुस्तकों का संग्रह है।

उत्तराखंड में कुमायुं की पहाड़ियों पर बसे कउसानी गांव में, जहाँ उनका बचपन बीता था, वहां का उनका घर आज ‘सुमित्रा नंदन पंत साहित्यिक वीथिका’ नामक संग्रहालय बन चुका है। इस में उनके कपड़े, चश्मा, कलम आदि व्यक्तिगत वस्तुएं सुरक्षित रखी गई हैं। संग्रहालय में उनको मिले ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रशस्तिपत्र, हिंदी साहित्य संस्थान द्वारा मिला साहित्य वाचस्पति का प्रशस्तिपत्र भी मौजूद है। साथ ही उनकी रचनाएं लोकायतन, आस्था, रूपम आदि कविता संग्रह की पांडुलिपियां भी सुरक्षित रखी हैं। कालाकांकर के कुंवर सुरेश सिंह और हरिवंश राय बच्चन से किये गये उनके पत्र व्यवहार की प्रतिलिपियां भी यहां मौजूद हैं। संग्रहालय में उनकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष पंत व्याख्यान माला का आयोजन होता है। यहाँ से ‘सुमित्रानंदन पंत व्यक्तित्व और कृतित्व’ नामक पुस्तक भी प्रकाशित की गई है। उनके नाम पर इलाहाबाद शहर में स्थित हाथी पार्क का नाम सुमित्रा नंदन पंत उद्यान कर दिया गया है।

सुमित्रानंदन पंत की कविता :

छायावादी युग के प्रवर्तकों में सुमित्रानंदन पंत का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। इनकी कविता में ना सिर्फ छायावादी प्रवृत्ति वरन् अपने समय में विकसित विचारधाराओं का वरण दिखाई देता है। उनकी काव्य रचना में प्रारंभ से लेकर अंत तक अनेक परिवर्तन और मोड़ दिखाई देते हैं। यह एक ऐसे कवि हैं जिनकी मान्यताएं, आदर्श और विचार समय के अनुसार बदलती रही हैं। आजीवन वह किसी आदर्श और विचार से बंधकर नहीं रहे। इसलिए उनकी कविता को समझने के लिए विचारकों ने तीन युगों में विभाजित किया जो निम्नलिखित हैं –

छायावादी युग (1918-36) – यह युग इनकी काव्य रचनात्मकता का प्रारंभिक युग माना जाता है। जिसके अंतर्गत वाणा से युगांत तक की रचनाओं को सम्मिलित किया जाता है।

प्रगतिवादी युग (1936-40) – यह एक ऐसा समय है जब हिंदी साहित्य में प्रगतिशील विचारधारा का प्रभाव प्रमुख रूप से पड़ रहा था। पंत भी इससे अछूते नहीं रहे। इन्होंने इस विचारधारा से प्रभावित होकर युगांत, युगवाणी तथा ग्राम्या जैसे काव्य संकलनों की रचना की।

आध्यात्मिक युग (1940 – अंत तक) – पंत की कविता के विकास में यह एक ऐसा चरण आया जब वह प्रगतिवाद से विमुख होकर आत्मवाद, ईश्वरवाद, अंहिसा आदि पर लिखते रहे। सन् 40 के बाद यह अरविंद दर्शन के प्रभाव में आते दिखाई देते हैं। इसक्रम में उन्होंने स्वर्ण किरण, स्वर्ण किरण, उत्तरा आदि की रचना की।

पंत की कविता में यह प्रवृत्तियां प्रमुख रूप से दिखाई देती हैं। समय सीमा को लेकर किये गये विभाजन से पंत की काव्य चेतना के विकास को समझा जा सकता है। पंत की रचनाओं का प्रारंभिक युग उसकी सौंदर्य भावनाओं की अभिव्यक्ति का युग है। जिसके अंतर्गत उनकी कविता के प्रेरणास्त्रोत प्रकृति रही है। कवि अपनी कविता में प्रकृति से सम्मोहित दिखाई देते हैं। उन्होंने लिखा है कि –

छोड़ द्रुमों की मृदु छाया तोड़ प्रकृति से भी माया

बाले तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन।।

प्रकृति के प्रति उनका यह प्रेम छायावादी काव्य की मूल चेतना है। प्रेम और सौंदर्य के प्रति मोह को भी पंत ने अपनी कविता में व्यक्त किया है। खासतौर पर प्रेम के संदर्भ में बात की जाए तो पंत पलायन वादी दिखाई देतें है। वेदना उनकी कविता का मूल तत्व बनकर उभरता है। इनकी कविता में प्रकृति के सौंदर्य को मानवीय संवेदना की अनुभूति के रूप में व्यक्त किया गया है। रहस्यात्मक संवेदना, पलायन, विस्मय, नारी के प्रति आकर्षण का भाव इनकी कविता की प्रमुख विशेषता है।

युगांत तक आते- आते कवि के भावों में परिवर्तन दिखाई देता है। प्रेम और सौंदर्य से विमुख कवि मानव मात्र के कल्याण की तरफ अग्रसर होता है। यह वो दौर था जब भारतीय समाज में कई तरह के वैचारिक और सैद्धांतिक परिवर्तन हो रहे थे जिसके प्रभाव में छायावादी कवियों का आना लाजिमी था। कवि यह कहने के लिए बाध्य हो जाते हैं कि –

जो सोये सपनों के तम में, वे जागेंगे यह सत्य बात

जो देख चुके जीवन निशीथ, वे देखेगें जीवन प्रभात ।।

कवि की विचारधारा ने धीरे – धीरे प्रगतिवाद की तरफ अपना रूख किया। यहीं से उनकी कविता के विकास का द्वितीय युग माना जा सकता है। इस युग तक आते आते छायावाद का सौंदर्यवादी कवि मानव मात्र के कल्याण की कल्पना करता है। कवि को यह विश्वास हो चला था कि मानवता का कल्याण पुरातनता के निर्मोह को उतार फेंकने में है। इसलिए वो कहते हैं, द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र..। पंत के विचारों में परिवर्तन बहुत ही जल्दी आता है, इसलिए उनके रचनाकाल में संवेदनात्मक रूप से लगातार परिवर्तन दिखाई देता है। समाज में व्याप्त वर्ग विभेद को देखकर उनका मन विचलित हो जाता है, इसलिए युगवाणी में उन्होंने एक ऐसे समाज की कल्पना की जिसमें वर्ग भेद ना हो वो कहते हैं कि :

श्रेणि में मानव नहीं विभाजित, धन बल से हो जहाँ न जन- श्रम शोषण

पंत की यहाँ स्त्री को मानव का स्थान दिया गया है, जहां रीतिकालीन काव्य ने औरत को वस्तु मात्र बनाकर प्रस्तुत किया वहीं वह कहते हैं कि :

योनि नहीं है रे नारी, वह भी मानवी प्रतिष्ठा,

उसे पूर्ण स्वाधीन करो ,  वह रहे ना नर पर अवसित।

इस तरह कवि के यहां सामूहिकता में सामान्य जन के विकास का रास्ता तैयार होता दिखाई देता है। इसलिए आलोचकों ने युगवाणी को भारतीय साम्यवाद की वाणी और पंत के विचारों को मार्क्सवादी कहा है।

मार्क्सवाद के प्रभाव से रचनाकार जल्दी ही मुक्त होते दिखाई देते हैं। प्रगतिवाद को अपनी कविता में वाणी देने के साथ साथ वह आत्मवाद, ईश्वरवाद, आहिंसावाद आदि पर कुछ ना कुछ लिखते ही रहे। कालांतर में वह 1940 के आस –पास अरविंद दर्शन से प्रभावित दिखाई देतें हैं। स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, उत्तरा, आदि रचनाओं पर अरविंद दर्शन का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अपने रचनात्मकता के अंतिम काल में आकर पंत पुनः प्रारंभिक संवेदना से जुड़ जाते हैं।

वह भौतिकवाद की उपेक्षा करने के साथ ही आध्यात्म की तरफ झुकते हुए दिखाई देतें हैं। एक ओर वे अरविंद के जड़ और चेतन के सामरस्य सिद्धांत को स्वीकृति देतें है और दूसरी तरफ उपनिषदों के चिंतन से भी प्रभावित दिखाई देतें हैं। भौतिकता तथा आध्यात्मिकता को उन्होंने एक दूसरे का विरोधी नहीं वरन् एक दूसरे का पूरक माना है। कवि पंत की इस युग की रचनाओं में भौतिक वैभव का आत्मिक सौंदर्य से, विज्ञान का धर्म से तथा कर्म का हृदय से समन्वय करते हुए आत्मबल के संचय का संदेश देते दिखाई देते हैं। उन्होंने लिखा है कि :

मेरा यह संदेश, उठों, हे जागो भूचर,

तुम हो मेरे अंश ज्योति, संतान तुम अमर,

छोड़ों जड़ता, छिन्न करों, भव भेदों का तम,

तुम हो मुझसे एक, एक तुम भूतों से, सम,

करो आत्मबल संचय, तोड़ों मन के बंधन।।

इन सब के अलावा कवि ने इस युग में रूढ़ियों के प्रति आक्रोश, अतीत के प्रति प्रेम, आस्तिकता का समर्थन, आदर्शवाद, मानवतावाद आदि को भी अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किया है। उन्होंने मानव कल्याण व्यष्टि और समष्टि के समन्वय तथा सांस्कृतिक उन्नति पर ही आधारित है। पंत की भाषा शैली उनकी कविता का एक महत्वपूर्ण पक्ष है ऐसा लगता है कि छायावादी काव्यात्मक ऊचाँइयों को प्राप्त करने के लिए कवि ने भाषा को अत्यधिक महत्व प्रदान किया है। शब्दों का चयन करते समय अत्यधिक सचेत दिखाई देतें हैं साथ ही प्रतीकमयता पर अत्यधिक जोर दिया गया है। इस तरह देखा जाए तो सौंदर्यवाद से लेकर मानवतावाद तक कवि पंत ने एक लंबी यात्रा तय की है जिसमें प्रकृति, प्रेम, जनवाद तथा अरविंद दर्शन प्रमुख पड़ाव हैं।

प्रकृति के सुकुमार कवि: सुमित्रानंदन पंत

आज भले ही हिन्दी साहित्य में छायावादी युग का अवसान हो चुका हो किन्तु यह सत्य है कि हिन्दी कविता छायावाद के एक अत्यन्त समृद्ध व सम्पन्न दौर से गुजरा है। हिन्दी में जब कभी छायावाद की चर्चा होती है, तब उसके चार सुदृढ स्तम्भों के रूप में प्रसाद, निराला, महादेवी वर्मा तथा सुमित्रानंदन पंत को याद किया जाता है। ये चारों उस युग के कवि हैं, जब हिन्दी कविता घुटनों के बल चलना सीख रही थी। सुमित्रानंदन ने जब लिखना शुरू किया, उस समय मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवि मौजूद होने के बावजूद हिन्दी को कविता की भाषा के रूप में मान्यता तक प्राप्त नहीं थी। प्रसाद व निराला के साथ मिलकर पंत ने हिन्दी को कविता की न केवल सौम्य, सुकुमार और सशक्त भाषा के रूप में एक सर्वथा नवीन प्रतिष्ठा दिलवाई बल्कि हिन्दी काव्य के लिए एक बिल्कुल नई शैली भी ईजाद की।

पंत जी की रचनाओं के बारे में प्रायः यह प्रश्न उठाया जाता रहा है कि वह संसारमुखी व यथार्थवादी होने के बदले रूमानी और अति आत्मकेन्द्रित क्यों है ? वस्तुतः यह हमारी समूची सांस्कृतिक विरासत का ही मूल तत्त्व व मौलिक स्वर है। हिन्दी कविता छायावादी युग के उस दौर में अपने प्रसव-संकट के समय उस आदि साँचे की ओर लौट गई, जो सदियों से भारतीय चेतना का मूल मातृ साँचा रहा है।

प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत अल्मोडा जिले के कोसानी नामक स्थान पर २० मई १९०० को जन्मे। कवि और पीडा के शाश्वत रिश्ते की सत्यता उनके जन्म के कुछ ही घंटों के बाद माँ की मृत्यु के रूप में प्रकट हुई। माँ के अभाव ने बालक सुमित्रानंदन को अपने पिता के बहुत अधिक निकट ला दिया। पिता गंगादत्त जी कोसानी में चाय बागानों की मैनेजरी के अलावा लकडी का कारोबार भी करते थे। आर्थिक स्थिति सुदृढ थी किन्तु युवावस्था में ही पत्नी के बिछोह से वह जीवन के प्रति विरक्त हो उठे। विरक्ति के बावजूद वह बालक सुमित्रानंदन पंत से अत्यधिक स्नेह रखते थे

पंत जी का बाल्यकाल अल्मोडा में उनके पिता द्वारा बनवाए गए शानदार व विशाल मकान में बीता। सन् १९०५ में वह विद्याध्ययन हेतु कोसानी पाठशाला में दाखिल किए गए। संस्कृत का प्रारम्भिक ज्ञान उन्हें अपने फूफा से प्राप्त हुए। नौ वर्ष की अल्पायु में बालक पंत ने मेघदूत, अमरकोश, चाणक्य आदि संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन पूर्ण कर लिया था। पंडित अम्बादत्त जोशी से पंत जी ने फारसी तथा अपने पिता से अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त की।

दस वर्ष की आयु में शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य से पंत जी अल्मोडा आए। यह उनके मानसिक विकास की दिशा में महत्त्वपूर्ण मोड था। इस दौरान वह स्वामी सत्यदेव के सम्फ में आए, जिन्होंने पंत जी के विचारों को एक साहित्यिक एवं राष्ट्रवादी स्पर्श प्रदान किया। पंत जी ने अल्मोडा में ही विधिवत हिन्दी साहित्य का अध्ययन प्रारम्भ किया। इस बीच उन्हें इलाचन्द्र जोशी, गोविन्दवल्लभ पंत और श्यामचरण पंत जैसे मित्र मिले। साहित्यिक गतिविधियों के कारण उनकी पढाई-लिखाई प्रभावित तो अवश्य हुई किन्तु फिर भी बदस्तूर चलती रही। उन्होंने अल्मोडा में नौवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की।

इस दौरान उन्होंने अपना नाम गोसाई दत्त से बदल कर सुमित्रानंदन पंत रख लिया। पंत जी ने कक्षा सातवीं या आठवीं में अध्ययन के दौरान ही कविकर्म को अपनाने का निश्चय कर लिया था।

एक बार सुमित्रानंदन पंत अपने पिता के साथ नैनीताल गए। वहाँ की प्राकृतिक सुषमा से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी प्रथम रचना ‘हार‘ लिखी। इस उपन्यास में नैनीताल के प्राकृतिक सौन्दर्य का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।

पन्द्रह वर्ष की आयु में पंत जी ने पद्य और छंदों में अभिनव प्रयोग करते हुए अनेक रचनाएँ लिखीं। उनकी प्रारम्भिक रचनाएँ समसामयिक विषयों व प्राकृतिक सौन्दर्य पर केन्द्रित थीं। ये रचनाएँ ‘सुधाकर‘, ‘मर्यादा‘ तथा अल्मोडा के स्थानीय अखबारों में छपती थीं।

अगस्त १९१८ में पंत जी ने बनारस के जयनारायण हाई स्कूल में प्रवेश लिया। इसी साल गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर वहाँ पधारे। पंत जी उनसे बहुत प्रभावित हुए। अगले वर्ष वह इंटर की परीक्षा पास करने प्रयाग के म्योर सेन्ट्रल कॉलेज आ गए, जहाँ उन्हें रामचन्द्र जी टंडन, परशुराम चतुर्वेदी, फिराक गोरखपुरी आदि हस्तियों के सम्फ में आने का अवसर मिला। सन् १९२१ में असहयोग आन्दोलन के दौरान गाँधी जी के आह्वान पर पंत जी ने कॉलेज छोड दिया।

सन् १९२६-२७ में पंत जी की पहली पुस्तक ‘पल्लव‘ के नाम से प्रकाशित हुई। इस समय आर्थिक रूप से पंत जी के परिवार की स्थिति अत्यधिक नाजुक थी। सारी जमापूँजी खर्च हो चुकी थी। हजारों रुपयों के कर्ज को चुकाने में जमीन जायदाद व घर का सामान तक बिक चुका था। १९२७ में बडे भाई रघुदत्त जी की मृत्यु ने पंत जी को अन्दर तक हिला कर रख दिया। पंत जी के पिता अपने बडे पुत्र की मृत्यु के सदमे को सहन नहीं कर पाए और डेढ साल बाद ही परलोक सिधार गए। संवेदनशील व भावुक पंत के लिए यह बहुत गहरा आघात था, जिसके कारण वह लम्बे समय तक अस्त-व्यस्त रहे।

सन् १९३० में पंत अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा आ गए। यहाँ उन्होंने फ्रायड, साम्यवाद, माक्र्सवाद आदि का गहन अध्ययन किया। वह माक्र्स के आर्थिक चिंतन से बेहद प्रभावित हुए। पूरनचन्द जोशी के सानिध्य में रहकर उनके विचारों में परिपक्वता आई। इस दौरान उन्होंने कवि के कल्पनाशील मन के लिए यथार्थ की नई जमीन तोडी। इस सम्बन्ध में पंत जी कहते हैं – ‘मेरे पाठक इस तथ्य से परिचित हैं कि काला कंकर के ग्राम जीवन के महान् सम्फ का प्रभाव मेरी समूची जीवन दृष्टि का एक अनिवार्य अंग बन चुका है। युगवाणी और ग्राम्या ही में नहीं, उसके बाद की रचनाओं में भी किसी न किसी रूप में और लोकायतन में विशेष रूप से उस दृष्टि की व्यापक छाप देखने को मिलती है।‘

पंत जी ने अपने भावों और विचारों को मूर्तरूप प्रदान करने के दृष्टिकोण से ‘लोकायतन‘ नामक संस्था की शुरुआत की किन्तु इसमें कुछ समय उन्हें खास कामयाबी नहीं मिली। पांडिचेरी के अरविन्द आश्रम में कुछ समय रहने के बाद पंत जी ने स्वयं को अरविन्द-दर्शन से अभिभूत पाया। अरविन्द विचार-श्ाृंखला का क्रमबद्ध अध्ययन करने के बाद पंत जी की जीवन दृष्टि ने और व्यापक आधारभूमि पाई। युगान्त, युगवाणी, स्वर्णकिरण आदि रचनाएँ उनके यथार्थोन्मुख रुख की ओर इंगित करती हैं।

सन् १९३८ में पंत जी ने ‘रूपाभ‘ नामक एक प्रगतिशील मासिक पत्र का संपादन भार संभाला। रघुपति सहाय, शिवदानसिंह चौहान, शमशेर जैसे लोगों के सम्फ में आने के बाद वह प्रगतिशील लेखक संघ से जुडे

१९५५ से १९६२ तक सुमित्रानंदन पंत आकाशवाणी के मुख्य प्रोड्यूसर के पद पर बने रहे। १९६१ में उन्हें भारत सरकार के उच्च राष्ट्रीय सम्मान ‘पद्मभूषण‘ से अलंकृत किया गया।

सन् १९६९ में सुमित्रानंदन पंत को उनकी काव्य कृति ‘चिदम्बरा‘ के लिए देश के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ‘ज्ञानपीठ‘ से सम्मानित किया गया। ‘चिदम्बरा‘ को वर्ष १९६८ की सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक कृति घोषित करते हुए कहा गया कि कवि पंत की ये काव्य रचनाएँ युग के संघर्षों की पृष्ठभूमि में नई सौन्दर्यबोध भावना, भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक विकास की शक्तियों के समन्वय से प्रसूत नैतिकता की धारा एवं उन्नत मनुष्यत्व की चेतना को रूपायित करती है। कवि पंत हिन्दी काव्य में आधुनिक युग के प्रवर्तकों तथा अभिनव काव्य-चेतना के प्रेरकों में अग्रगण्य हैं।

आजीवन अविवाहित रहे हिन्दी साहित्य के इस महत्त्वपूर्ण लेखक ने तीन नाटक, एक कहानी संग्रह, एक उपन्यास, एक संस्मरण संकलन सहित करीब चालीस पुस्तकें लिखीं, जो उनकी निरन्तर सृजनशीलता को रेखांकित करती हैं। ‘उच्छ्वास‘, ‘गुंजन‘, ‘वीणा‘ आदि छायावादी कृतियों से शुरू हुआ यह साहित्यिक सफर अरविन्द-दर्शन और साम्यवादी युग-चेतना से प्रभावित ग्रंथों ‘युगांत‘, ‘स्वर्णकिरण‘, ‘उत्तरा‘, ‘पतझड‘, ‘शिल्पी‘ में सिमटता हुआ ‘कला और बूढा चाँद‘ जैसी यथार्थवादी रचना तक पहुँचा। इस रचना पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। ७७ वर्ष की आयु में सुमित्रानंदन पंत का निधन हो गया, जो सचमुच हिन्दी साहित्य जगत् की अपूरणीय क्षति था

पंत जी हिन्दी के छायावादी युग चार के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रकृति के एक मात्र माने जाने वाले सुकुमार कवि श्री सुमित्रानंदन पंत जी बचपन से ही काव्य प्रतिभा के धनी थे और 16 वर्ष की उम्र में अपनी पहली कविता रची “गिरजे का घंटा”। तब से वे निरंतर काव्य साधना में तल्लीन रहे।

कवि या कलाकार कहां से प्रेरणा ग्रहण करता है इस बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए पंत जी कहते हैं, संभवतः प्रेरणा के स्रोत भीतर न होकर अधिकतर बाहर ही रहते हैं। अपनी काव्य यात्रा में पन्त जी सदैव सौन्दर्य को खोजते नजर आते हें। शब्द, शिल्प, भाव और भाषा के द्वारा कवि पंत प्रकृति और प्रेम के उपादानों से एक अत्यंत सूक्ष्य और हृदयकारी सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं, किंतु उनके शब्द केवल प्रकृति-वर्णन के अंग न होकर एक दूसरे अर्थ की गहरी व्यंजना से संयोजित हैं। उनकी रचनाओं में छायावाद एवं रहस्यवाद का समावेश भी है। साथ ही शेली, कीट्स, टेनिसन आदि अंग्रेजी कवियों का प्रभाव भी है।

यह धरती कितना देती है

मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे,
सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे,
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी
और फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूँगा!
पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा,
बन्ध्या मिट्टी नें न एक भी पैसा उगला!-
सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल हो गये!
मैं हताश हो बाट जोहता रहा दिनों तक
बाल-कल्पना के अपलर पाँवडडे बिछाकर
मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे,
ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था!

अर्द्धशती हहराती निकल गयी है तबसे!
कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने,
ग्रीष्म तपे, वर्षा झूली, शरदें मुसकाई;
सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे, खिले वन!
औ\’ जब फिर से गाढ़ी, ऊदी लालसा लिये
गहरे, कजरारे बादल बरसे धरती पर,
मैंने कौतूहल-वश आँगन के कोने की
गीली तह यों ही उँगली से सहलाकर
बीज सेम के दबा दिये मिट्टी के नीचे-
भू के अंचल में मणि-माणिक बाँध दिये हो!
मैं फिर भूल गया इस छोटी-सी घटना को,
और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन!
किन्तु, एक दिन जब मैं सन्ध्या को आँगन में
टहल रहा था,- तब सहसा, मैने देखा
उसे हर्ष-विमूढ़ हो उठा मैं विस्मय से!

देखा-आँगन के कोने में कई नवागत
छोटे-छोटे छाता ताने खड़े हुए हैं!
छांता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की,
या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं प्यारी-
जो भी हो, वे हरे-हरे उल्लास से भरे
पंख मारकर उड़ने को उत्सुक लगते थे-
डिम्ब तोड़कर निकले चिडियों के बच्चों से!
निर्निमेष, क्षण भर, मैं उनको रहा देखता-
सहसा मुझे स्मरण हो आया,-कुछ दिन पहिले
बीज सेम के मैने रोपे थे आँगन में,
और उन्हीं से बौने पौधो की यह पलटन
मेरी आँखों के सम्मुख अब खड़ी गर्व से,
नन्हें नाटे पैर पटक, बढती जाती है!

तब से उनको रहा देखता धीरे-धीरे
अनगिनती पत्तों से लद, भर गयी झाड़ियाँ,
हरे-भरे टंग गये कई मखमली चँदोवे!
बेलें फैल गयी बल खा, आँगन में लहरा,
और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का
हरे-हरे सौ झरने फूट पड़े ऊपर को,-
मैं अवाक् रह गया-वंश कैसे बढ़ता है!
छोटे तारों-से छितरे, फूलों के छीटे
झागों-से लिपटे लहरों श्यामल लतरों पर
सुन्दर लगते थे, मावस के हँसमुख नभ-से,
चोटी के मोती-से, आँचल के बूटों-से!

ओह, समय पर उनमें कितनी फलियाँ फूटी!
कितनी सारी फलियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ,-
पतली चौड़ी फलियाँ! उफ उनकी क्या गिनती!
लम्बी-लम्बी अँगुलियों – सी नन्हीं-नन्हीं
तलवारों-सी पन्ने के प्यारे हारों-सी,
झूठ न समझे चन्द्र कलाओं-सी नित बढ़ती,
सच्चे मोती की लड़ियों-सी, ढेर-ढेर खिल
झुण्ड-झुण्ड झिलमिलकर कचपचिया तारों-सी!
आः इतनी फलियाँ टूटी, जाड़ो भर खाई,
सुबह शाम वे घर-घर पकीं, पड़ोस पास के
जाने-अनजाने सब लोगों में बँटबाई
बंधु-बांधवों, मित्रों, अभ्यागत, मँगतों ने
जी भर-भर दिन-रात महुल्ले भर ने खाई !-
कितनी सारी फलियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ!

यह धरती कितना देती है! धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को!
नही समझ पाया था मैं उसके महत्व को,-
बचपन में छिः स्वार्थ लोभ वश पैसे बोकर!
रत्न प्रसविनी है वसुधा, अब समझ सका हूँ।
इसमें सच्ची समता के दाने बोने है;
इसमें जन की क्षमता का दाने बोने है,
इसमें मानव-ममता के दाने बोने है,-
जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसलें
मानवता की, – जीवन श्रम से हँसे दिशाएँ-
हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे।

वसंत

मिटे प्रतीक्षा के दुर्वह क्षण,

अभिवादन करता भू का मन !
दीप्त दिशाओं के वातायन,
प्रीति सांस-सा मलय समीरण,
चंचल नील, नवल भू यौवन,
फिर वसंत की आत्मा आई,
आम्र मौर में गूंथ स्वर्ण कण,
किंशुक को कर ज्वाल वसन तन !
देख चुका मन कितने पतझर,ग्रीष्म शरद, हिम पावस सुंदर,
ऋतुओं की ऋतु यह कुसुमाकर,
फिर वसंत की आत्मा आई,
विरह मिलन के खुले प्रीति व्रण,

स्वप्नों से शोभा प्ररोह मन !
सब युग सब ऋतु थीं आयोजन,
तुम आओगी वे थीं साधन,
तुम्हें भूल कटते ही कब क्षण?
फिर वसंत की आत्मा आई,देव, हुआ फिर नवल युगागम,
स्वर्ग धरा का सफल समागम !

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