बड़ा फैसला

ग्वालियर न्यूज 4 इंडिया। उच्च न्यायालय ने मध्यप्रदेश में शिक्षकों से कराए जा रहे गैर शैक्षणिक कार्यों पर पूर्णतः रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति शील नागू एवं न्यायमूर्ति अशोक कुमार जोशी की युगलपीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य शासन तथा केन्द्र सरकार से चार सप्ताह में जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

राजपत्रित प्रधानाध्यापक प्रादेशिक संघ की अध्यक्ष अर्चना राठौर द्वारा अधिवक्ता अवेधेश सिंह भदौरिया के माध्यम से हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका प्रस्तुत कर कहा कि मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा हर साल करोड़ों रूपए खर्च किए जा रहे हैं। नगर निगम, बिजली विभाग व अन्य विभाग स्कूलों के उत्थान के लिए शिक्षा कर के नाम से उपभोक्ताओं से करोड़ों रूपए टैक्स के रूप में वसूल करते हैं। इसके बावजूद मध्यप्रदेश के सरकारी स्कलों की हालत एवं गुणवत्ता दिनो-दिन खराब होती जा रही है। शिक्षक संघ इसके लिए शिक्षकों से शिक्षण कार्य के अलावा अन्य कार्य कराए जाने को दोषी मानते हैं। स्कूलों में आज भी मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। स्वच्छ भारत अभियान के बाद भी स्कूल परिसरों में गंदगी के ढेर लगे हुए हैं। निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार का उद्देश्य भी विफल हो रहा है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता भदौरिया ने कहा, हाल ही में शिक्षकों को शौचालय के गड्ढे खुदवाने और उसी दिन शाम को फोटो भेजने के भी आदेश दिए गए हैं। इससे पहले शिक्षकों को सामूहिक विवाह कार्यक्रम में खाना परोसने, प्याज संकट के दौरान प्याज बंटवाने, साल भर निर्वाचन नामावली में कार्य कराना तथा अन्य कार्यों में लगाया जाता है। इस कारण 10वी और 12 का परिणाम खराब हो रहा है।

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