भोपाल । मध्य प्रदेश के करोड़ों रुपये के गेहूं का विवाद डेढ़ साल बाद भी नहीं सुलझ पाया है। केंद्र सरकार इसे सेंट्रल पूल में लेने के लिए राजी नहीं है। दरअसल, कमल नाथ सरकार ने खरीद से पहले किसानों को प्रति क्विंटल 165 रुपए प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा कर दी थी। केंद्र सरकार ने इसे बोनस माना और छह लाख टन गेहूं सेंट्रल पूल में लेने से इन्कार कर दिया है। यह मामला तभी से चल रहा है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पत्र लिखने के साथ दिल्ली प्रवास के दौरान इस मुद्दे को उठा चुके हैं। वहीं, सरकार ने अब खरीद और सेंट्रल पूल में अनाज देने की रणनीति में भी बदलाव कर लिया है। इसके तहत धान की खरीद के साथ-साथ मिलिंग कराई जाएगी और शुरुआत से ही सेंट्रल पूल में भी चावल दिया जाएगा। इससे गुणवत्ता को लेकर भी बाद में विवाद नहीं होगा।
मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्य विकेंद्रीकृत प्रणाली के तहत गेहूं, धान सहित चुनिंदा फसलों की न्यूनतम समर्थन पर खरीद करते हैं। इसके लिए अनुबंध किया गया है। इसके तहत खरीद प्रारंभ होने के पहले और बीच में सरकार बोनस या ऐसी कोई घोषणा नहीं कर सकती है, जिससे बाजार प्रभावित होता हो। इसके बाद भी कमल नाथ सरकार ने गेहूं खरीद से पहले किसान समृद्धि योजना के नाम से 165 रुपये प्रति क्विंटल प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की थी। इसे केंद्र सरकार ने बोनस माना और निर्देश दिए कि राज्य से सिर्फ उतना गेहूं सेंट्रल पूल में लिया जाए, जितना केंद्रीय योजनाओं के लिए लगता है। इसके बाद राज्य सरकार ने दबाव बनाया तो धीरे-धीरे केंद्र सरकार ने 67 लाख टन गेहूं सेंट्रल पूल में ले लिया पर छह लाख टन से ज्यादा गेहूं का मामला अभी भी अटका हुआ है।
समिति भी की गठित
खाद्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि केंद्र सरकार यदि गेहूं नहीं लेती है तो करोड़ों स्र्पये का वित्तीय भार राज्य सरकार पर आ जाएगा। इसके निपटारे के लिए कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता में समिति भी बनाई पर अभी तक अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। बताया जा रहा है कि सरकार की कोशिश है कि केंद्र सरकार इस गेहूं को ले ले। यही वजह है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लगातार प्रयास कर रहे हैं। मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस, प्रमुख सचिव खाद्य नागरिक आपूर्ति फैज अहमद किदवई भी केंद्रीय अधिकारियों से संवाद कर रहे हैं।
आगे की रणनीति तैयार
सरकार ने ऐसी स्थिति आगे फिर न बने और सेंट्रल पूल में अनाज लगातार जाए, इसके लिए रणनीति तैयार की है। इसके तहत धान समर्थन मूल्य पर खरीदने के साथ-साथ मिलिंग कराई जाएगी। इसके लिए कस्टम मिलिंग में ही प्रविधान कर दिया है। मिलिंग के बाद 60 फीसद चावल प्रदेश को और 40 प्रतिशत सेंट्रल पूल में मिल संचालक को देना होगा। यह काम शुरुआत से होगा ताकि सेंट्रल पूल में उठाव को लेकर परेशानी न हो।
अभी तक धान खरीद के बाद मिलिंग शुरू कराई जाती थी। सूत्रों का कहना है कि इस व्यवस्था से एक फायदा यह भी होगा कि जब भारतीय खाद्य निगम को पहले से चावल दिया जाएगा तो गुणवत्ता की भी जांच हो जाएगी क्योंकि निगम गुणवत्ता जांचने के बाद ही चावल लेता है। खाद्य आपूर्ति निगम के प्रबंध संचालक अभिजीत अग्रवाल ने बताया कि कस्टम मिलिंग नीति में धान खरीद के साथ मिलिंग और चावल देने के प्रविधान किए गए हैं।