अंबिकापुर।  सूरजपुर जिले के रमकोला से लगे धूरिया में बाड़े में कैद चीतलों के आहार में कटौती कर दी गई है। चीतलों को स्वच्छंद विचरण के लिए बाड़े का दायरा भी बढ़ा दिया गया है। भोजन के लिए संघर्ष की यह परिस्थिति चीतलों के लिए रिहाई का संदेश है। जंगल मे जब उन्हें छोड़ा जाएगा तो चारा-पानी का इंतजाम उन्हें खुद करना होगा। बाड़े से छोड़े जाने से पहले नैसर्गिक वातावरण के लिए उन्हें तैयार करना शुरू कर दिया गया है।

गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र से लगे तमोर पिंगला अभयारण्य इलाके में वन्य प्राणियों की मौजूदगी है। शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के वन्य प्राणियों के लिए यह अभयारण्य और गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान अनुकूल बना रहे इसके लिए भोजन चक्र को बनाए रखने विभागीय स्तर पर भी कोशिश हो रही है। बारनवापारा से 30 से अधिक चीतल को लगभग 2 वर्ष पहले लाया गया था। इन चीतलों को सीधे जंगल में छोड़ने से पहले ग्राम धूरिया में बनाए गए चीतल बाड़े में रखा गया था।

अब इनकी संख्या में भी वृद्धि हो चुकी है। लगभग 2 वर्ष से बाड़े में कैद चीतलो के चारा, पानी और रखरखाव के लिए वन विभाग को अतिरिक्त राशि भी खर्च करनी पड़ती है। यही वजह है कि चीतलों को नैसर्गिक वातावरण में स्वच्छंद विचरण करने छोड़ देने की मांग विभागीय तौर पर उच्चाधिकारियों से की गई थी। विभाग की ओर से इन चीतलों को जंगल में छोड़ने की अनुमति देने प्रस्ताव वन मुख्यालय भेजा गया था। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्य प्राणी और अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्य प्राणी जब प्रतापपुर क्षेत्र में निरीक्षण पर पहुंचे थे तब उन्होंने धूरिया में चीतल बाड़े का भी अवलोकन किया था।

विशेषज्ञों की राय के अनुरूप चीतल बाड़ा विकसित किया गया है। चीतल बाड़े को दो हिस्से में विभाजित किया गया था।दोनों हिस्से एक दूसरे से लगे हुए हैं। शुरू में बाड़े का दायरा कम रखा गया था ताकि सारे चीतल एक साथ रह सके और उन्हें पर्याप्त चारा दिया जा सके। अब अधिकारियों के निर्देश पर दो बाड़े के बीच का अवरोध हटा दिया गया है। चीतलों को कई एकड़ वन क्षेत्र में विचरण करने की छूट दे दी गई है।विभागीय तौर पर चीतलों के लिए जो चारा पानी की व्यवस्था की जा रही थी, उसमें भी कटौती कर दी गई है।

इस कटौती के पीछे का उद्देश्य चीतलों को भूखा रखना नहीं बल्कि उन्हें सुरक्षित भविष्य के लिए तैयार करना है, जब उन्हें जंगल में छोड़ा जाएगा तब चारा, पानी की व्यवस्था उन्हें खुद करनी होगी इसलिए विभागीय कर्मचारी पालतू बन चुके इन चीतलों को जंगल में रहने लायक बनाने अनुकूलन करने में लगे हुए हैं। छत्तीसगढ़ के अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्य प्राणी अरुण पांडेय का कहना है कि ये जंगली जानवर है, लेकिन धूरिया में रहते-रहते इनकी कई आदत पालतू जानवर जैसी हो चुकी है।

अभी तक इन चीतलों को बिना किसी मेहनत के चारा, पानी मिल जाया करता था। यदि हम इन्हें आज की स्थिति में जंगल में छोड़ देंगे तो यह चीतलों के साथ अन्याय होगा इसलिए हम उनकी आदत जंगल में रहने लायक बनाने में लगे हैं, जिस बारे में वे रहते थे। उसका दायरा और बढ़ा दिया गया है, जितना चारा हम उन्हें उपलब्ध कराते थे। अब उन में कटौती की गई है। इसके पीछे उद्देश्य है कि चीतल लंबे-चौड़े बाड़े में घूम कर अपने लिए आहार की व्यवस्था कर सक। किसी भी वन्य प्राणी के लिए यह अनुकूलन जरूरी होता है अन्यथा भविष्य में दिक्कत आ जाती है, विभाग अब इन चीतलों को जंगल में छोड़ने तैयार है। नए सिरे से प्रस्ताव आते ही हम जंगल मे चीतलों को छोड़ देंगे।