भगवती लक्ष्मी ऐसे घरों में निवास करती हैं जो साफ-सुथरे होते हैं जहां पशु-पक्षियों को आहार दिया जाता है और जहां क्षुधा पीड़ितों को अन्न वितरित किया जाता है और जहां परिवार के सदस्य भगवान को ही अपने जीवन का सर्वस्व मानते हैं। जो कभी अप्रिय वाणी नहीं बोलते और दुर्व्यवहार नहीं करते जो अध्यवसाय, संतोष, प्रशांति के गुणों के धनी होते हैं तथा जिनके कर्मों के लाभार्थियों का दायरा अपनों तक सीमित न रह कर परिचित, अपरिचित, निकट और दूर के सभी लोगों तक फैला हुआ होता है और जिनके बाजू इतने लम्बे होते हैं कि उनसे वे पूरे संसार को अपने प्रेमालिंगन में ले सकते हैं।आइए जानें, धर्मग्रंथ क्या कहते हैं?


सदाचारिता, ईमानदारी तथा निरहंकारता (विनीतता) के गुण मेरे वास स्थान हैं। (महाभारत, शांतिपर्व, भगवती लक्ष्मी, प्रह्लाद, संवाद में भगवती लक्ष्मी का कथन)

मैं वहां रहती हूं जहां लोग सत्यवादी होते हैं, वैराग्य तप के प्रति निष्ठावान होते हैं तथा परोपकार के कार्यों में रत रहते हैं। (महाभारत, शांतिपर्व, भगवती लक्ष्मी, इंद्र-संवाद में भगवती लक्ष्मी का कथन)

मैं उन पुरुषों में निवास करती हूं जो क्रोधजयी हैं और कत्र्तव्यनिष्ठ होते हैं। मैं उन स्त्रियों में निवास करती हूं जो गो-सेवा और देव विप्र की पूजा करती हैं। (महाभारत, अनुशासन पर्व, भगवती लक्ष्मी, रुक्मिणी संवाद में भगवती लक्ष्मी के कथन का भीष्मद्वारा उद्धरण)।

भगवती लक्ष्मी का वास-स्थान गोमय है। जो स्थान गोमय से लीपे जाते हैं उन स्थानों में भगवती लक्ष्मी स्वयं पहुंच जाती हैं। (स्कंदपुराण)


निष्कर्ष : लाक्षणिक शैली में यह कहा जा सकता है कि भगवती लक्ष्मी के वास स्थान सामंजस्य के गारे और सद्गुणों की इष्टिकाओं से निर्मित किए हुए होते हैं।

इस लेख में वर्णित तथ्यों का निहितार्थ यह है कि भूलोक में भगवती लक्ष्मी का दर्शन प्राप्त करने के लिए हम सबको अपने विचारों, वाणी और कर्मों के दर्पण में उपर्युक्त सामंजस्य को प्रतिबिबिंत होने देना चाहिए और अपने आप को उपर्युक्त सद्गुणों का साकार रूप बनाना चाहिए।

अपनी भौतिक सम्पदा को पर हितार्थ उपयोग में लाना चाहिए। यदि हम गृहस्थ हैं तो हमें भगवत प्रेम में पगे हुए उत्तम चरित्र के निष्कलंक गृहस्थ बनना चाहिए।

इस प्रकार भगवती लक्ष्मी का दर्शन करना उनकी पूजा करने का एक उत्तम ढंग है। उनकी इस प्रकार की पूजा जीवन का निर्माण करने वाली एक लम्बी प्रक्रिया है, जो हमारे जीवन को दूसरों के लिए उपयोगी बनाती है तथा पर्वों के अवसर पर और मंदिरों में की जाने वाली (भगवती लक्ष्मी की) पूजा को अनुपूरित करती है। संक्षेप में जहां (भगवान और उनकी सृष्टि के साथ) सामंजस्य है वहां भगवती लक्ष्मी का वास है।

जहां सौंदर्य है, वहां भगवती लक्ष्मी का वास है। जहां प्रेम है, वहां भगवती लक्ष्मी का वास है। जहां उदारता है, वहां भगवती लक्ष्मी का वास है। जहां समृद्धि है, वहां भगवती लक्ष्मी का वास है। जहां आदर्श गृहस्थ है, वहां भगवती लक्ष्मी का वास है।