नई दिल्‍ली । धरती पर बिगड़ते पयार्वरण और जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंतित भारत चाहता है कि इससे उत्पन्न आपदाओं के चलते हुए नुकसान की भरपाई की जाए। संयुक्‍त राष्‍ट्र के सीओपी26 जलवायु शिखर सम्‍मेलन में भारत जिन इस बारे में भी आवाज उठाएगा। एक रिपोर्ट के अनुसार, पर्यावरण मंत्रालय अगले महीने ग्‍लासगो में होने वाले सम्‍मेलन की तैयारियों को अंतिम रूप दे रहा है। मंत्रालय के सबसे वरिष्‍ठ नौकरशाह रामेश्‍वर प्रसाद गुप्‍ता ने कहा, 'हम बस इतना कह रहे हैं कि जो खर्च हुआ है, उसकी भरपाई होनी चाहिए और इसे विकसित देशों को वहन करना चाहिए।' उन्होंने कहा कि भारत इस मसले पर निम्‍न आय और विकासशील देशों के साथ खड़ा है। हर साल होने वाले सीओपी सम्‍मेलन में हिस्‍सा लेने दुनियाभर से नेता और डिप्‍लोमेट्स पहुंचेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसमें शामिल होंगे। जलवायु परिवर्तन के दुष्‍प्रभावों को लेकर 'करो या मरो' की स्थिति के बीच इस सम्‍मेलन में कोई ठोस कार्ययोजना सामने आ सकती है। भारत ने अमेरिका के जलवायु दूत जॉन केरी के आगे भी जलवायु आपदाओं के मुआवजे के मसले को उठाया था। ग्रीनहाउस गैसों का सबसे ज्‍यादा उत्‍सर्जन अमीर देशों ने ही किया है जिसके चलते धरती गर्म होती जा रही है।
2015 के पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते में 'हानि और क्षति' का जिक्र था मगर किसकी देनदारी होगी और क्‍या प्रक्रिया होगी, यह साफ नहीं था। 2013 में वारसाव सम्‍मेलन से ही इसको लेकर चर्चा शुरू हो चुकी थी, लेकिन तकनीकी पहलुओं पर अब भी कुछ डीटेल्‍स उपलब्‍ध नहीं हैं।  भारत चाहता है कि ग्‍लोबल लेवल पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्‍सर्जन के ऐतिहासिक डेटा को देखते हुए संबंधित देश प्रदूषण से होने वाले नुकसान की भरपाई करें। जिन देशों पर जलवायु परिवर्तन का असर पड़े, वे इस पैसे पर दावा करके राहत और मरम्‍मत के काम करा सकते हैं। भारत सालाना स्‍तर पर तीसरा सबसे बड़ा उत्‍सर्जक है और ऐतिहासिक नजर से शीर्ष 10 में से है। मतलब यह कि उसे भी अपनी जेब ढीली करनी होगी। भारत दुनिया की शीर्ष 10 अर्थव्‍यवस्‍थाओं में से इकलौता ऐसा देश है जिसने अपने उत्‍सर्जन को शून्‍य करने का लक्ष्‍य नहीं रखा है।
पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि अभी यह तय नहीं हुआ है कि वैश्विक जलवायु चुनौती से निपटने के लिए किस देश को कितनी वित्तीय सहायता मिलेगी। उन्होंने कहा कि ऐसे कई मुद्दे हैं जिन पर चर्चा होगी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि विकसित देशों को विकासशील देशों को प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर की सहायता के अपने वादे को पूरा करने की याद दिलाई जाए।