6 वर्ष में कम हो गए मलेरिया के 96 फीसदी केस


भोपाल । मप्र सरकार द्वारा मलेरिया उन्मूलन की दिशा में किए जा रहे प्रयासों का रंग दिखने लगा है। मप्र में मलेरिया के मामले में पिछले छह साल में करीब 96 प्रतिशत मरीजों की कमी आई है। इससे उम्मीद जगी है कि 2025 के अंत तक यानी 2026 में मप्र मलेरिया मुक्त हो जाएगा। सरकारी कोशिश और जागरुकता के चलते मलेरिया के मामलों में कमी तो आई है, लेकिन अब भी इसे पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका है। बीते सात सालों में प्रदेश में मलेरिया के मामले सात गुना तक कम हुए हैं। सात साल पहले तक शहर में हर साल मलेरिया के 125 से 150 मरीज सामने आते थे, जो अब घटकर 15 रह गए हैं। जनवरी 2024 से अब शहर मे मलेरिया के महज तीन मामले ही सामने आए हैं। कुछ यही हाल प्रदेश का है।
गौरतलब है की मप्र में कोरोना काल से मरीजों की कमी देखी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना काल में लोगों ने साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखा यही कारण है कि मलेरिया के केस लगातार कम हो रहे हैं। मलेरिया राज्य कार्यक्रम अधिकारी डॉ. हिमांशु जयसवार ने बताया कि मध्य प्रदेश में मलेरिया कम होने के प्रमुख कारण कोरोना की वजह से लोग साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देने लगे और मच्छरों में काफी कमी आई। मलेरिया विभाग नगर निगम और एंबेड परियोजना के सहयोग से प्रदेश भर में जनजागरूकता अभियान चलाया। स्कूल, कॉलेज से लेकर धर्मगुरुओं को भी इस अभियान में शामिल किया। अभियान में एंबेड परियोजना के कर्मचारी झुग्गी बस्तियों तक पहुंच कर लोगों को जागरूक किया। मलेरिया विभाग के आकड़े को देखें तो जहां वर्ष 2015 में 25 जिले कैटेगरी 3 में सम्मिलित थे, वहीं वर्ष 2023-24 में एक भी जिला कैटेगरी 3 में सम्मिलित नहीं है। इस प्रकार प्रदेश सभी जिलों में मलेरिया एपीआई एक से कम दर्ज किया गया है।

 अब 3000 में एक पॉजिटिव मरीज मिल रहा


2018 में प्रदेश में 22,000 से ज्यादा मरीज मिले थे जो 2024 में घटकर तीन हजार रह गए। दरअसल, बीमारी देने वाली मादा एनाफिलीज का गणित समझ में आते ही विभाग के साथ लोगों ने जागरुकता बरती और मलेरिया के मामले भी घटने लगे। इन पांच सालों में मलेरिया से सिर्फ सात मरीजों की मौत हुई है, जबकि 2010 तक हर साल मलेरिया से दर्जनों मौत होती थीं। इन सबके बावजूद मलेरिया अभियान पूरी तरह सफल नहीं है। दरअसल सरकार ने 2030 तक मलेरिया को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य तय किया था। बावजूद अब भी तीन हजार मरीज हर साल मिल रह हैं। मलेरिया विभाग की मानें तो जनवरी से अब तक 1,21,933 संदिग्धों की जांच की, लेकिन सिर्फ 3 सैंपल ही रहे। 2022 में 4,26273 सैंपलों की जांच में महज 19 मलेरिया पॉजिटिव मिले। 2023 में 5,28243 सैंपलों में 13 मरीज मिले थे।

ऐसे कम हुए प्रदेश में मलेरिया केस


जिला मलेरिया अधिकारी अखिलेश दुबे ने बताया कि मलेरिया संक्रमित मादा एनोफिलीज के काटने से होता है। साफ और 20 मिलीलीटर ठहरे पानी में ये मच्छर में पनपता है। उम्र छह से आठ सप्ताह है। केंद्र सरकार का 2030 तक मलेरिया खात्मे का लक्ष्य व अभियान सफल हो रहा है। 2018 में संचारी रोग अभियान में 30 दिन गांव-शहर में सफाई, जलभराव न होने, स्कूलों में बच्चों को जानकारी देने अभियान में 12 विभाग शामिल हुए। ठहरे साफ पानी में एंटी लार्वा छिडक़ाव, केरोसिन छिडक़ना और पानी को ढंक कर रखने जागरुकता किया। गांव-गांव मलेरिया रथ भेजा, शिविर में जांच, लोगों को जागरूक करने नुक्कड़ नाटक समेत अन्य आयोजन किए गए।मलेरिया को को खत्म करने के लिए लगातार अभियान चलाया जा रहा है। यही कारण है कि यह रोग धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। आने वाले सालों में मलेरिया पूरी तरह से खत्म हो जाएगा।

मलेरिया मुक्त होने की कगार पर मप्र


नेशनल सेंटर फॉर वेक्टर बोर्न डिसीज कंट्रोल (एनसीवीबीडीसी) की रिपोर्ट के मुताबिक जल्द मलेरिया मुक्त होने वाले 21 राज्यों में मप्र का भी नाम है। यहां बीते छह साल से निरंतर मरीजों की संख्या कम हो रही है। इतना ही वर्ष 2021 के बाद से मप्र में मलेरिया से किसी भी व्यक्ति की मौत नहीं हुई है। एनसीवीबीडीसी की वेबसाइट पर मौजूद रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2024 तक मप्र में सिर्फ 47 लोगों को ही मलेरिया हुआ है। जबकि इसके पूर्व के वर्षों में मलेरिया पॉजीटिव मरीजों की संख्या 3 हजार से ज्यादा रही है। बीते सात सालों में प्रदेश में मलेरिया के मामले सात गुना तक कम हुए हैं। सात साल पहले तक शहर में हर साल मलेरिया के 125 से 150 मरीज सामने आते थे, जो अब घटकर 15 रह गए हैं। जनवरी 2024 से अब शहर में मलेरिया के महज तीन मामले ही सामने आए हैं। कुछ यही हाल प्रदेश का भी है। 2018 में प्रदेश में 22000 से ज्यादा मरीज मिले थे जो 2023 में घटकर महज 3793 ही रह गए। दरअसल, बीमारी देने वाली मादा एनाफिलीज का गणित समझ में आते ही विभाग के साथ लोगों ने जागरुकता बरती और मलेरिया के मामले भी घटने लगे। इन पांच सालों में मलेरिया से सिर्फ सात मरीजों ने ही दम तोड़ा है, जबकि 2010 तक हर साल दर्जनों मौत मलेरिया से होती थीं।